भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था 

पाठ्यक्रम: GS3/अंतरिक्ष क्षेत्र

संदर्भ 

  • भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था, जिसका वर्तमान मूल्य लगभग 8 अरब अमेरिकी डॉलर है तथा जो वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में 2–3% का योगदान करती है, आगामी दशक में पाँच गुना बढ़कर 40–45 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है। साथ ही, वर्ष 2030 तक इसकी वैश्विक हिस्सेदारी को 8% तक बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र : प्रमुख शक्तियाँ

  • लागत प्रतिस्पर्धात्मकता : भारत के अंतरिक्ष मिशनों की लागत वैश्विक मानकों की तुलना में अत्यंत कम है।
    • मंगलयान मिशन की लागत लगभग 74 मिलियन अमेरिकी डॉलर थी, जबकि अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA के MAVEN मिशन की लागत लगभग 671 मिलियन अमेरिकी डॉलर थी।
    • इससे भारत किफायती प्रक्षेपण एवं उपग्रह सेवाओं के लिए एक प्रमुख वैश्विक केंद्र के रूप में उभरा है।
  • सिद्ध उपलब्धियाँ: वर्ष 2023 में चंद्रयान-3 द्वारा चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफल अवतरण।
    • आदित्य-L1 सौर वेधशाला मिशन।
    • वर्ष 2025 में स्पेस डॉकिंग प्रयोग (SpaDeX) की सफलता।
    • न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड, जो इसरो की वाणिज्यिक शाखा है, वैश्विक उपग्रह प्रक्षेपणों का प्रबंधन कर रही है।
    • ये उपलब्धियाँ अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की समग्र क्षमता को प्रदर्शित करती हैं।
  • विविध औद्योगिक अनुप्रयोग : अंतरिक्ष-आधारित आँकड़ों का उपयोग निम्नलिखित क्षेत्रों में किया जा रहा है—
    • कृषि (फसल निगरानी)
    • आपदा प्रबंधन
    • शहरी नियोजन
    • रक्षा
    • नौवहन (NavIC)
    • मौसम पूर्वानुमान इस प्रकार अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था उत्पादक क्षेत्रों के व्यापक दायरे में समाहित हो चुकी है।
  • रणनीतिक स्वायत्तता :
    • स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन विकास।
    • GSLV एवं LVM3 प्रक्षेपण यान।
    • प्रस्तावित गगनयान मानव अंतरिक्ष मिशन।
    • इन पहलों ने नागरिक एवं रक्षा उपग्रहों के लिए विदेशी प्रक्षेपण अवसंरचना पर भारत की निर्भरता को कम किया है।

हालिया संरचनात्मक सुधार

  • अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) उदारीकरण, 2024: उपग्रह निर्माण एवं संचालन, प्रक्षेपण यानों तथा स्पेसपोर्ट्स में 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति प्रदान की गई है।
    • इनमें से 74% तक निवेश स्वचालित मार्ग के अंतर्गत अनुमत है।
    • इससे भारतीय अंतरिक्ष उद्यमों के लिए वैश्विक पूंजी आकर्षित करने का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
  • भारतीय अंतरिक्ष नीति, 2023: यह नीति अंतरिक्ष क्षेत्र की प्रमुख संस्थाओं की भूमिकाओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित करती है—
    • ISRO – अनुसंधान एवं विकास तथा राष्ट्रीय मिशन।
    • न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड – वाणिज्यिक संचालन।
    • IN-SPACe – निजी क्षेत्र के लिए नियामकीय सुविधा प्रदाता।
    • इससे एक सुव्यवस्थित त्रिस्तरीय पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण हुआ है।
  • IN-SPACe: यह एकल-खिड़की (Single Window) नियामक संस्था है।
    • निजी कंपनियों को इसरो की सुविधाओं, प्रक्षेपण अवसंरचना एवं तकनीकी विशेषज्ञता तक पहुँच प्रदान करती है।
    • इससे निजी क्षेत्र के प्रवेश अवरोधों में उल्लेखनीय कमी आई है।
  • भू-स्थानिक डेटा उदारीकरण, 2021: 1 मीटर से कम रिज़ॉल्यूशन वाले भू-स्थानिक डेटा के लिए लाइसेंसिंग आवश्यकताओं को समाप्त कर दिया गया।
    • इससे निजी मानचित्रण, विश्लेषण तथा स्थान-आधारित प्रौद्योगिकी कंपनियों को अंतरिक्ष-आधारित डेटा पर आधारित वाणिज्यिक उत्पाद विकसित करने का अवसर मिला।

महत्त्व

  • आर्थिक गुणक प्रभाव: अंतरिक्ष क्षेत्र में निवेश किया गया प्रत्येक 1 डॉलर, उपग्रह संचार, रिमोट सेंसिंग, सटीक कृषि तथा नौवहन सेवाओं के माध्यम से 7–8 डॉलर की अतिरिक्त आर्थिक गतिविधि उत्पन्न करता है।
  • रक्षा एवं सुरक्षा:
    • सैन्य उपग्रह निगरानी।
    • एन्क्रिप्टेड संचार।
    • मिसाइल ट्रैकिंग प्रणाली।
    • स्वदेशी अंतरिक्ष अवसंरचना पर आधारित ये क्षमताएँ विदेशी निर्भरता के बिना भारत की सामरिक प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ बनाती हैं।
  • जलवायु एवं आपदा प्रत्यास्थता: उपग्रह निम्नलिखित कार्यों में सहायता प्रदान करते हैं—
    • वास्तविक समय में बाढ़ मानचित्रण।
    • चक्रवातों की निगरानी।
    • वनाग्नि की पहचान एवं निगरानी।
    • ये भारत की जलवायु अनुकूलन एवं आपदा जोखिम न्यूनीकरण रणनीतियों को सुदृढ़ बनाते हैं।
  • वैश्विक प्रक्षेपण बाजार में हिस्सेदारी : भारत ने वर्ष 2030 तक वैश्विक वाणिज्यिक प्रक्षेपण बाजार में 10% हिस्सेदारी प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
    • NSIL द्वारा अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के साथ किए गए प्रक्षेपण सेवा अनुबंध भारत को यूरोपीय एवं अमेरिकी प्रदाताओं के एक विश्वसनीय तथा कम-लागत विकल्प के रूप में स्थापित कर रहे हैं।

चुनौतियाँ 

  • निजी क्षेत्र के विस्तार की चुनौती: 400 से अधिक अंतरिक्ष कंपनियों की उपस्थिति के बावजूद अधिकांश भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप अभी भी प्रारंभिक राजस्व अवस्था में हैं।
    • सीमित घरेलू खरीद आवश्यकताओं के कारण वे प्रोटोटाइप स्तर से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।
  • नियामकीय विलंब: स्पेस एक्टिविटीज़ विधेयक अभी लंबित है।
    • इससे दायित्व, बौद्धिक संपदा अधिकार तथा स्पेक्ट्रम आवंटन से संबंधित कानूनी अनिश्चितताएँ बनी हुई हैं।
  • कुशल मानव संसाधन की कमी: उन्नत एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के लिए प्रणोदन, सामग्री विज्ञान तथा एम्बेडेड प्रणालियों में विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है।
    • भारतीय विश्वविद्यालय वर्तमान में पर्याप्त संख्या में ऐसे विशेषज्ञ तैयार नहीं कर पा रहे हैं।
  • अवसंरचना तक सीमित पहुँच: निजी प्रक्षेपण कंपनियाँ मुख्यतः श्रीहरिकोटा स्थित इसरो के प्रक्षेपण स्थलों पर निर्भर हैं।
    • सीमित प्रक्षेपण स्लॉट एवं समय-निर्धारण संबंधी चुनौतियाँ वाणिज्यिक प्रक्षेपणों की आवृत्ति को प्रभावित करती हैं।
  • वैश्विक प्रतिस्पर्धा की तीव्रता:
    • SpaceX की स्टारलिंक सेवा,
    • एरियनस्पेस,
    • तथा चीन की बढ़ती वाणिज्यिक प्रक्षेपण क्षमता
    • मूल्य निर्धारण एवं बाजार हिस्सेदारी पर दबाव उत्पन्न कर रही हैं, जिससे भारत को अपनी क्षमताओं का तीव्र विस्तार करना आवश्यक हो गया है।
  • महत्वपूर्ण खनिजों पर निर्भरता: उपग्रह एवं प्रक्षेपण यान निर्माण के लिए दुर्लभ मृदा तत्वों तथा उन्नत मिश्रित पदार्थों की आवश्यकता होती है।
    • इनमें से अनेक संसाधनों का भारत आयात करता है, जिससे आपूर्ति शृंखला संबंधी जोखिम उत्पन्न होते हैं।

आगे की राह

  • निजी संचालकों के लिए दायित्व, बौद्धिक संपदा अधिकार, कक्षीय स्लॉट प्रबंधन एवं स्पेक्ट्रम अधिकारों पर कानूनी स्पष्टता प्रदान करने हेतु स्पेस एक्टिविटीज़ विधेयक को शीघ्र पारित किया जाना चाहिए।
  • सरकारी विभागों के लिए घरेलू अंतरिक्ष उत्पादों की खरीद के लक्ष्य निर्धारित किए जाने चाहिए, जिससे भारतीय स्टार्टअप्स को सुनिश्चित मांग प्राप्त हो सके।
  • IITs एवं NITs में प्रणोदन, एवियोनिक्स एवं उपग्रह प्रणालियों से संबंधित विशेष एयरोस्पेस इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम विकसित किए जाने चाहिए।
  • निजी संचालकों की पहुँच के साथ एक द्वितीय प्रक्षेपण परिसर विकसित किया जाना चाहिए, जिससे इसरो पर निर्भरता कम हो तथा राष्ट्रीय प्रक्षेपण क्षमता में वृद्धि हो।
  • अमेरिका के आर्टेमिस समझौते, फ्रांस तथा जापान के साथ अंतरिक्ष सहयोग समझौतों का उपयोग उन्नत प्रौद्योगिकी, संयुक्त मिशनों एवं निर्यात बाजारों तक पहुँच के लिए किया जाना चाहिए।
  • दीर्घकालिक निवेश की आवश्यकता वाले डीप-टेक अंतरिक्ष स्टार्टअप्स को वित्तीय सहायता प्रदान करने हेतु RDI कोष के अंतर्गत अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था विकास कोष की स्थापना की जानी चाहिए।

स्रोत: PIB

 

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